नुआंव के कर्मठ पत्रकार ने सदर अस्पताल में तोड़ा दम, जिले में शोक की
बक्सर। “तू कल चला जाएगा तो मैं क्या करूंगा… तू याद बहुत आएगा तो मैं क्या करूंगा…”—यह पंक्तियाँ आज जिले के पत्रकारों के दर्द को बयां कर रही हैं। पत्रकारिता जगत ने एक ऐसा निडर, ईमानदार और संवेदनशील सिपाही खो दिया है, जिसकी कमी आने वाले वर्षों तक खलती रहेगी। जिले के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह का शनिवार देर रात हृदयाघात से अचानक निधन हो गया। नुआंव गाँव निवासी संतोष सिंह ने सदर अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके असामयिक निधन की खबर सुनते ही पूरा जिला स्तब्ध रह गया।
शनिवार की रात करीब 10 बजे वे एक वैवाहिक समारोह में शामिल थे। चारों ओर खुशियों का माहौल था, लेकिन इसी दौरान अचानक उनके सीने में तेज दर्द उठा। परिजन और साथियों ने बिना देर किए उन्हें सदर अस्पताल पहुँचाया, जहाँ दो घंटे तक डॉक्टरों की टीम लगातार संघर्ष करती रही। कुछ समय के लिए उनकी हालत स्थिर होती दिखाई दी, जिससे परिवार और मित्रों में उम्मीद की एक हल्की किरण जगी। पर नियति को शायद कुछ और मंजूर था। थोड़ी ही देर बाद उन्हें दूसरा और तीव्र हृदयाघात हुआ, जिसने उन्हें हमेशा के लिए खामोश कर दिया। डॉक्टरों के निरंतर प्रयास भी उन्हें जीवन के मैदान में टिकाए नहीं रख सके। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक हृदय में गंभीर ब्लॉकेज ही उनकी मौत का मुख्य कारण बना।
उनके निधन की सूचना सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। संतोष सिंह अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र और तीन पुत्रियों को रोता-बिलखता छोड़ गए हैं। संघर्षों से भरे जीवन में वे माता-पिता के इकलौते पुत्र थे और उनके गुजरने के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन्होंने ही संभाली थी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह क्षति अपूरणीय है।
संतोष सिंह सिर्फ खबर लिखने वाले पत्रकार नहीं थे, वे पत्रकारिता के मूल सत्य—ईमानदारी, निष्पक्षता, संवेदनशीलता और जनसेवा—के जीवंत प्रतीक थे। उनकी लेखनी में सच्चाई की ताकत थी और स्वभाव में अपनापन। साथियों के लिए वे प्रेरणा थे, आम लोगों के लिए भरोसा।
उनके अचानक निधन से जिले के मीडिया संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनमानस में शोक की लहर दौड़ गई है। श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा है, और हर आंख नम है।
संतोष सिंह भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी निष्ठा, उनकी पत्रकारिता और उनके जीवंत सिद्धांत हमेशा याद किए जाते रहेंगे।




