श्मशान में भी मजबूरी की कीमत! अंतिम विदाई के वक्त गरीब की जेब पर बोझ
श्मशान घाट बना दुकान,, पैसा मिलेगा तो होगा शव दाह

बक्सर। जिंदगीभर मेहनत करके परिवार का पेट पालने वाला मजदूर जब किसी अपने को अंतिम विदाई देने चरित्रवन स्थित गंगा किनारे श्मशान घाट पहुंचता है, तो उसकी आंखों में आंसू और मन में अपनों को खोने का दर्द होता है। ऐसे कठिन वक्त में यदि अंतिम संस्कार के लिए जरूरी लकड़ी की कीमत को लेकर उसे परेशान होना पड़े, तो यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।
चरित्रवन श्मशान घाट पर सिरफल की लकड़ी की कीमत 3 हजार रुपये प्रति क्विंटल मांगे जाने का आरोप सामने आया है। परिजनों के मुताबिक, जब उन्होंने जिला प्रशासन के वरीय अधिकारियों से लिखित शिकायत करने की बात कही, तो दुकानदार ने कीमत आधी कर दी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि कीमत उचित थी, तो शिकायत की बात सामने आते ही उसमें इतनी बड़ी कमी कैसे आ गई? हालांकि, पूरे मामले की आधिकारिक जांच और तथ्यों की पुष्टि होना जरूरी है।
श्मशान घाट कोई सामान्य बाजार नहीं, जहां ग्राहक मोलभाव करने की स्थिति में हो। यहां पहुंचने वाला हर व्यक्ति किसी अपने को खोने के असहनीय दुख से गुजर रहा होता है। उसके लिए उस समय सबसे जरूरी होता है अपने प्रियजन को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देना।
जरा उस गरीब मजदूर की स्थिति सोचिए, जो दिनभर कुदाल चलाकर या गटर साफ करके महज 400 रुपये की दिहाड़ी कमाता है। उसी कमाई से घर का चूल्हा जलता है, बच्चों का पेट भरता है। ऐसे परिवार के लिए अंतिम संस्कार का खर्च जुटाना भी बड़ी चुनौती बन सकता है।
दुकान है,, या,, शमशान घाट
स्थानीय लोगों ने जिलाधिकारी से

मामले की गंभीरता से जांच कराने की मांग की है। लकड़ी की निर्धारित दर, वास्तविक बिक्री मूल्य, तौल में इस्तेमाल होने वाले तराजू-बटखरों के सत्यापन और संबंधित नियमों के अनुपालन की जांच जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है और शिकायत मिलने पर कार्रवाई कौन करेगा।
श्मशान में चिता की लकड़ियां जलकर राख हो जाती हैं, लेकिन व्यवस्था पर उठे सवाल राख नहीं होने चाहिए। अंतिम विदाई के वक्त किसी परिवार को अपने दुख के साथ कीमतों की मनमानी से भी न लड़ना पड़े—यही संवेदनशील प्रशासन और मानवीय व्यवस्था की असली कसौटी है।




